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जिन्हें हम 'इन्तेज़ार' और आप 'वक़्त' कहते हैं

जिन्हें हम 'इन्तेज़ार' और आप 'वक़्त' कहते हैं
हम एक रिश्ता और आप एक लफ्ज़ कहते हैं,

बुधवार, 7 अक्तूबर 2009

‘चेहरे’...(श्री रंजन का कहानी संग्रह)- प्रकाशन : अंश प्रकाशन, x - 3282, गली सं-4, गांधीनगर, दिल्ली-३१. प्रथम संस्करण- २००८ मूल्य- 110/- कुल पृष्ठ- 104



             श्री  रंजन  का  कहानी -संग्रह  ‘चेहरे’   पढने  का  अवसर  मिला . रंजन  जब  ये  कहते  हैं  कि  “उम्र  के  पचपनवें  वर्ष  में  मैंने  अपनी  पहली  कहानी   लिखी -‘तो  सलाम  मेरे  दोस्तों ’, सहसा  विश्वास  नहीं  होता  कि लेखक  की  ये  स्वीकारोक्ति  एक  अतिरिक्त  सौजन्यता  के  कारण  है  या  अत्म्श्लाघापूर्ण , या  फिर  वाकई  ये  विनम्रता  से  भरी  हुई  सच्चाई  है . लेकिन जैसे-जैसे एक-एक कहानी मेरे आगे खुलती गयी, मुझे यही लगा कि  बात को बिना लाग-लपेट के कहना रंजन जी कि अपनी अदा है, जो इस संग्रह की प्रत्येक कहानी में हर जगह मौजूद है. 
          संग्रह की पहली कहानी ही- ‘तो  सलाम  मेरे  दोस्तों ’- इस बात की गवाह है, जिसके मूल में यों तो भागलपुर का सांप्रदायिक दंगा है, परन्तु पूरी कहानी में फैंटेसी की एकतानता है, जो दंगे-जैसे गंभीर मुद्दे को उभरने नहीं देती. कहानी में 'प्लैनचेट'  का ज़िक्र है, जिसके इर्द-गिर्द कहानीकार के यथार्थ दोस्तों के रेखाचित्र उभरते हैं.  एक समय था, देवकीनंदन खत्री के ज़माने में,  जब हिंदी कहानी-कला मूलतः फैंटेसी या प्रेमचंदीय आदर्शवाद के इर्द-गिर्द रहा करती थी; 'प्लैनचेट' के नाम से लोग प्रायः अनभिज्ञ नहीं थे, पर आज के ज़माने में नयी  पीढी न तो इसके बारे में कुछ जानती है, ना ही इसपर विश्वास करने को तैयार होगी. 
            लेकिन इस कहानी की दो विशेषताएं ऐसी हैं, जिसके कारण ये श्रवणीय भी है, और पठनीय भी. सबसे पहली विशेषता ये कि इसमें  दृश्यों और घटनाओं के विवरण इतने प्रामाणिक और प्रासंगिक रूप से हैं कि लगता है जैसे हम स्वयं उनके साक्षी रहे हों. बल्कि सच्चाई ही ये है कि कहानी में आये तमाम नाम और चरित्र यथार्थ हैं- "तो मंज़र है, शहर भागलपुर के चौराहे का....खलीफाबाद....और खलीफाबाद में स्थित मशहूर  'चित्रशाला'. (इस आलीशान दूकान के मालिक कहानीकार स्वयं हैं.)....."सामने चाय की दूकान पर लोग-बाग़ खड़े-खड़े कुल्ल्ह्ड में चाय पीते हुए बतिया रहे थे. उसकी बगल वाली दूकान के अन्दर बैठा लड़का मोबाइल फोन की रिपेरिंग करने में व्यस्त था. 'साउंड ऑफ़ म्यूजिक'   नाम की टीवी की दूकान वाले ने सड़क के छोर तक फ्रिज और वाशिंग मशीन के ढेर लगा रखे थे."
             इन यथार्थ विवरणों के कारण कहानी में आदि से अंत तक रोचकता बरकरार रहती है, क्योंकि इसमें प्रवाह है, बिम्ब्धर्मिता है और वर्णना की मौलिकता है.  कहानी में फैंटेसी भी अंत में आता है, जब मशहूर कथाकार मंटो की आत्मा को 'प्लैनचेट' के माध्यम से बुलाया जाता है और उसके माध्यम से कहानी का आतंरिक अर्थ- दंगा, मज़हबी जुनून, कट्टरवादिता- आदि खुलता है. यहीं पर कहानी हांफने भी लगती है, जब कहानी का स्वर अचानक उपदेशात्मक हो जाता है; विशेषकर तब, जब उर्दू के लफ्जों का इस्तेमाल करते-करते मंटो एकाएक शुद्ध हिंदी के शब्दों का प्रयोग करने लगते हैं.  
संग्रह  की दूसरी  कहानी  ‘अक्सर  उसके  साथ  ही  ऐसा  क्यों  होता  है ’, जैसा  स्वयं  लेखक  की  स्वीकारोक्ति  है ,”इस  कहानी  के  मूल  में  थे  मेरे  मित्र  डॉ  अमरेन्द्र ….भागलपुर  के  इक  ग्रामीण  अंचल  में  ये  एक  ऐसे  कॉलेज   में  प्राध्यापक  थे , जो  अपनी  अफ्फिलिअशन  के  लिए  उस  वक़्त  प्रयत्नशील  था . उस  कॉलेज  की  त्रासदी , शोषण  और  प्राध्यापकों  का  संघर्ष …वास्तव  में  बेहद  भयानक  था  और  मुझसे     एक  कहानी  की  मांग  करता  था ”. कथाकार  जब  अपनी  रचना -प्रक्रिया  के  बाबत  कुछ  कह  देता  है  तो  दूसरों  के  कहने  की   ज्यादा  गुंजाइश  नहीं  होती . फिर  भी , इस  कहानी  में  एक  अभावग्रस्त  व्यक्ति  की  पीडा  और  अवसरवादी  कुटिल  लोगों  की  चालें  प्रमुखता  से  उभर  कर  सामने  आयी हैं . आज  शोषण  का  शिकार  सिर्फ  निचला  तबका  ही  नहीं  हो  रहा , बल्कि  मध्यवर्ग  का  बुद्धिजीवी  भी  भुगत  रहा  है , ये  इस  कहानी  से  स्पष्ट  है .
इसी  प्रकार  ‘पगला  था  वह ’ कहानी  संवेदनशील  लोगों  को  आज  के  ज़माने  में  मूर्ख   समझे  जाने  के  भाव को  प्रदर्शित  करती  है , जहाँ  कभी -कभी  दूसरों  की  मदद  करना  एक  अभिशाप  बन  जाता  है  और   मदद  करने  वाला  मुर्ख  तथा  पागल  समझा  जाता  है . ये  आज  के  यथार्थ  को  ‘व्यू फ़ाइन्दर’ से  देखने  की  कोशिश  है .
संग्रह  की  कहानी  ‘शून्य  में  टंगा  प्रश्न ’ मनोवैज्ञानिक  धरातल  का  स्पर्श  करती  है .  सच (डर) सबके  मन  के  अन्दर  होता  है , और  सभी  उसे  झुठलाना  चाहते  हैं . इसे  मनोविज्ञान  की  भाषा  में  superego   कहते हैं . ये  हर  व्यक्ति  के  भीतर  होता  है , जिसके  चलते  वह  अपने  को  सर्वश्रेष्ठ  और  दूसरों  को  हीन  समझता  है .
‘चार  अठन्नी ’ कहानी  तो  सीधे -सीधे  प्रेमचंदीय  परंपरा  की  कहानी  लगती  है , गांधीवाद  का  स्पर्श  करती  हुई . इस  लिहाज़  से  ये  थोडी  outdated  लगती  है  और  संग्रह  की  सबसे  कमज़ोर  कहानी  भी .
संग्रह  की  अंतिम  कहानी  ‘ज़िन्दगी  का  नाटक ’ में  बेटी  की  शादी  के  लिए  चिंतित  मध्यवर्गीय  परिवार  का  व्यक्ति  किसी  प्रकार  क़र्ज़  लेकर  व्यवस्ता  करता  है  तब  भी  उसकी  आशाएं  पूरी  नहीं  होतीं , इसका  चित्रण  अत्यंत  नाटकीय  ढंग  से   किया   गया  है . वस्तुतः  इस  कहानी  में  भरपूर  नाटकीय तत्व  हैं , इसलिए  ये  नाटक  के  ज्यादा  करीब  है .
             कुल  मिलाकर  संग्रह  की  कहानियों  में  सहजता  है , सरलता  है , बेबाकी  है . इनमें  आज  का  यथार्थ  परोसा  गया  है , जिनमें  अनावश्यक  चौंकाने  वाले  तत्व  अथवा   भाषा  की   कलाकारी  नहीं  है . 


मंगलवार, 6 अक्तूबर 2009

सोमवार, 5 अक्तूबर 2009

           सबसे पहले तो ये नाम- कनुप्रिया- मुझे बहुत पसंद है. शायद इसके मूल में धर्मवीर भारती की 'कनुप्रिया' पुस्तक के प्रति बेहद आसक्ति होना हो. इसलिए आपके ब्लॉग पर आना मुझे बहुत संतोष दे गया, सायद कहीं मुक्त भी कर गया मुझे.
            मैं सोच ही रहा था अपनी डायरी के पन्नों के सच को बाहर लाने के लिए, कि आपके लिखे ने मुझे गहन रूप से झिंझोर डाला, कि कहना आसान हुआ, कि पुरानी यादों में लौटने का इमकान हुआ.

रविवार, 4 अक्तूबर 2009

कुछ बना, कुछ अधबना सच लेकर अपने-अपने हिस्से का कौन-सा  ऐसा दुःख है, जो जलाता भी है और तृप्त भी करता है कि कुछ खोकर भी पाने का उपालंभ देता है....
अद्भुत है आपका ये प्रयास. इतने सारे स्केचेज और तस्वीरें क्या आपकी खुद की बनायीं हुई हैं...? अगर हैं तो कबीले तारीफ़ हैं. हमारे यहाँ भी पधारिये.
-भारती-

शनिवार, 3 अक्तूबर 2009

अप्रकाशित

'आपकी गज्जो'- एकल नाटक-राजीव रंजन श्रीवास्त
           राजीव रंजन श्रीवास्तव पटना रंगमंच में एक जाना-पहचाना नाम हैंवे लगभग  एक दशक से लेखक, निर्देशक और अभिनेता के रूप में सक्रिय हैं तथा हमेशा अभिनव प्रयोगों में संलग्न रहते हैं
अभी-अभी एक एकल नाटक उन्होंने मुझे पढने के लिए दिया- 'आपकी गज्जो'। लगभग ४० मिनट की अवधि का बनेगा ये नाटकये अभी ताज़ा है, प्रस्तुति के लिहाज़ से भी और अपने कथ्य के हिसाब से भी..... शायद अद्भुत...!
          ये नाटक एक ऐसी लड़की- गजाला- की आत्मस्वीकृति है, जो हमारे आपके घरों के आसपास- कहीं भी मिल जाएँगी, नाम उनके चाहे कुछ भी होंलेकिन गजाला की तरह हर लड़की विशिष्ट नहीं बन पाती, क्योंकि शायद वो सदियों से चली रही रवायतों और रस्मों के हाथों दफन कर दी जाती है
           इसके विपरीत इस गजाला के जीवन में अभाव है, दुःख है, बेबसी का पसरा हुआ सन्नाटा है; फिर भी होश है, हुनर है और हौसला है कुछ कर गुजरने कागजाला प्रतीक है उन तमाम लड़कियों की जो आज भी अभावों और मुफलिसी में जीती हुई अपने सपनो की तितलियों को रोज़ मरते देखने के लिए अभिशप्त हैं-
"मुहल्ले में दूसरों को मदरसे जाते देख,
किताबें पढ़ते देख
मुझे भी ललक होती की काश
मैं भी मदरसे जाती...."
         बदलते समाज और उसकी विसंगतियों के बीच गजाला का अंतर्द्वंद्व एक समूची पीढी के दर्द का बयान है, जहाँ कुछ कर पाने का उत्साह है तो बहुत कुछ नहीं कर पाने की बेबसी भी-
"मेरा भी मन होता की बुल्ला भाई की तरह मैं भी
मकतब में झूम-झूम कर पढूं
इसीलिए तो मैं बैठती थी
मस्जिद की सीढियों पर।
घर आकर बगैर किताबों के
झूठ-मूठ नक़ल करती आपकी गजाला
मेरा खूब मन करता की पढूं, पढूं और पढ़ती ही जाऊँ।"
         लेकिन इस बेबसी के भीतर जो थोड़ा-बहुत भी कर पाने का जज्बा है, वो ही गजाला को विशिष्ट  बनाता है- 
"अब्बू , मैं पढूंगी....
अब्बू, हदीस में भी है, कुरान में भी रत मोहम्मद साहब ने कहा है-
'तलाव्वुलिल्मे अलाकुल्ले मुस्लिम'
अब्बू बोल उठे-
'इसका मतलब बेटा...?'
मैंने कहा-
'तालीम और इल्म सारे मुस्लिमों के लिए लाज़मी है
इस बार अब्बू थोड़े संयत थे- बोले-
'बेटा, हमारे  यहाँ  केवल  लड़के  मकतब - मदरसा  जाते  हैं , 
लडकियां  नहीं. 
'लेकिन  मैं  तो  पढूंगी '
उनहोंने  कुछ  पल  सोचा ,
फिर  अच्छा  कहकर  निकल  पड़े ".
          गजाला के इस जज्बे   की  सच्चाई है, उसके बचपन के अभाव में, उसकी अम्मी के गुज़र जाने के वजूहात में....
"एक दिन तो मैंने कई तरह की आँखें बना डालीं
हंसती- मुस्कुराती आँखें, 
रोती हुई उदास आँखें , 
घबराई, बेचैन आँखें, 
चुलबुली और शरारती आँखें...
गुस्साई और तमतमाई आँखें,
शरमाई और लजाई आँखें,
आँखें...आँखें...आँखें...
सैकडों तरह की आँखें बनीं...
उन आँखों में मैं सबकी आँखें खोजने लगी...
अब्बू की अम्मी को खोजती आँखें,
अम्मी की प्यार वाली आँखें,
सोहेल की, साबिर की, बुल्ला की...  
साकिर  चा की...
मास्साब  की आँखें...."

              लेकिन इन सारे अभावों और गुर्बतों के बीच गजाला का संघर्ष और उसके 'बैक ड्रॉप' में वेदना का स्वर- 'शाहिद नहीं है' मोहब्बत के मुक़द्दस रूप से रु-बा-रु कराता है-
"आज भी याद है-
आर्ट कॉलेज की सीढियां ...
जिसपर शाहिद के साथ घंटों बैठती
पीछे का जंगल, गंदा बड़ा-सा नाला 
नामी-गिरामी चित्रकारों की पेंटिंग्स का बंद कमरा....
टाईपराइटर पर तक-तक करते क्लर्क,
पत्थरों को काट कर बनाये गए बाहरी परिसर में सोया कुत्ता... 
कॉलेज को ताकता हॉस्टल 
और हॉस्टल और कॉलेज के बीच लगे 
बाएं से तीसरे पेड़ के नीचे 
चाकू से उकेरा था हमनें 
'गजाला............चौदह दिसम्बर, उन्नीस सौ ..........'
शाहिद नहीं मिला..."
            प्रेम की ये पीर कहीं अन्दर तक चीरती हुई चली जाती है.
            कुल मिलाकर ये एकल नाटक अपनी बिम्बधर्मिता में बहुत कुछ कह जाता है, जिसे संवेदना के स्तर पर ही पकडा जा सकता है, और शायद उससे कहीं ज्यादा अनुभव किया जा सकता है. बावजूद इसके एकल नाटक में अंतर्द्वद्व की तीव्रता को जिस कलात्मक चरमसीमा तक पहुंचाने की आवश्यकता होती है, इसमें वो घनीभूत होने से रह गयी है. ऐसा शायद इसलिए हुआ है की लेखक के सामने नाटक का एक लक्ष्य (मिशन) स्पष्ट है, जो एकाधिक स्थानों पर संदेशात्मक रूप में दिखाई भी देता है-
"अम्मी कुछ भी पढ़ी होतीं या 
उन्हें कुछ भी तालीम हासिल हुई होती 
तो शायद अम्मी आज साथ होतीं."
"अब तो गजाला उन लड़कियों को 
अलग से पढाने का जिम्मा भी लेती है 
जो स्कूल जा पाने से लाचार हैं,
और जिनके यहाँ पढना भी बंदिश है"
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