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जिन्हें हम 'इन्तेज़ार' और आप 'वक़्त' कहते हैं

जिन्हें हम 'इन्तेज़ार' और आप 'वक़्त' कहते हैं
हम एक रिश्ता और आप एक लफ्ज़ कहते हैं,

रविवार, 1 नवंबर 2009

एक पल का मधुमास


              सुनील  केशव देवधर आकाशवाणी के चन्द गिने-चुने अधिकारियों में से एक हैं, जिनकी पहचान संस्था के अन्दर जितना कर्मठ, लगनशील और सर्जक प्रस्तोता के रूप में है; उतना ही उसके बाहर संवेदनशील कवि-साहित्यकार और गुणी व्यक्ति के रूप में. वे हमेशा नया करने के लिए तत्पर रहते हैं. वे पढाकू हैं, मेहनती हैं और बेहतरीन आवाज़ के मालिक भी. मित्र हैं, और ये मित्रता 'तू तू, मैं मैं' की हदों को भी छूती है, इसलिए अनौपचारिक भी है. नौकरी के लम्बे हसीन पल साथ बिताएं हैं, जिनमें वैचारिक विमर्श भी शामिल है.
             
हाल में ही सुनील देवधर का एक नया सर्जनात्मक रूप उनके द्वारा सृजित एल्बम 'एक पल का मधुमास' (ऋतुओं कि कहानी : गीतों की ज़बानी)  में दिखाई देता है. इसकी संकल्पना, निर्मिती, गीत, लेखन और निवेदन- सब सुनील देवधर का है. संगीत संयोजन केदार दिवेकर और परीक्षित ढ्वले का है.
                  इस एल्बम में कुल आठ गीत हैं, जो अलग-अलग रंगों में ऋतुओं की कहानी गाते हैं.
                 
एल्बम के प्रथम गीत के पूर्व निवेदन में सुनील की उदात्त और गूंजती आवाज़ बताती है कि इस देश में समय का विभाजन विभिन्न ऋतुओं के आधार पर हुआ है. इस दृष्टि से हर ऋतू एक नए वर्ष की शुरुआत मानी जा सकती है.  ये एक नई दृष्टि है. ये गीत कहरवा ताल में राग हंसध्वनि पर आधारित है-

                  "चलो मिल स्वागत करें सहर्ष,
                   कि आया है नववर्ष."
इस गीत में गायकी के चमत्कार के साथ बांसुरी का अभिनव प्रयोग हुआ है, जो आलाप के साथ और भी ऊर्जस्वित होता है.  इसके अंतरे की धुन में मेलोडी के अन्दर रिदम  का सृजन बेहद आकर्षक ढंग से किया गया है और तराने का  अद्भुत विकास  इस  गीत की समाप्ति  को  एक नया अंदाज़ देता है.
             
भारतीय परंपरा में चैत्र मास से नववर्ष का आरम्भ माना जाता है, जिसका प्रतिनिधि है बसंत.
              "आया फिर सुखमय बसंत,                       
              फैली मधुगंध फिर अनंत."
राग गौड़ सारंग की अभिव्यक्ति लिए ये गीत सितार और बांसुरी के लाक्षणिक प्रयोगों से ओतप्रोत है. इसमें सितार के साथ बांसुरी का एक अंतर्लाप चलता है, जिसकी गायन-पृष्ठभूमि में हार्मोनी का प्रयोग इसे विशिष्ट बनाता है. साथ ही, इस गीत में counter melody  का अद्भुत प्रयोग हुआ है.
         
इसके बाद आता है फाल्गुन मास. दादरा ताल के छंद और राग नट भैरव की छाया से प्रारंभ गीत- "फागुनी मौसम के गीत ये सुहाने, फगवाडे सब आये मिलकर गाने" में ताल-वाद्यों का अद्भुत संयोजन है. इस गीत में फागुनी मौसम की अलमस्ती है, बहार है, उत्साह है और तेजस्विता है.
             
एल्बम का चौथा गीत है, "रंग उडे लाल और नीला केसरिया है आज". राजस्थानी बीट के रंगों में रंगा ये होली गीत राग वृन्दावनी सारंग और राग जोग के सम्मिश्रण से उपजता है. ये गीत लोकसंगीत को प्रतिध्वनित करता हुआ एक विशिष्ट चित्रपट का सृजन करता है. इस लोक फाग में सृजन, रिदम और बीट्स का लालित्यपूर्ण सृजन है जो ग्रामीण श्रृंगार की उत्सवधर्मिता को साकार करने में सक्षम है. इस गीत की विशिष्टता है, शास्त्रीय संगीत के तत्त्वों का लोकरस में सुगम रूपांतरण जिससे मेलोडी और माधुर्य का श्रृंगार रस बरसता है.


एल्बम के पांचवें गीत में भी उत्सवधर्मिता है, पर उसमें वैश्विकता का रंग भी चढा है. ये रंग है समता का, रंगभेद मिटाकर सबको एक रंग में रंग जाने का. यही जीवन का सरस संगीत है.
              "रंगों का मौसम है, रंगों का साथ है;
               सुधियों के आँगन में रस की बरसात है".
राग भैरवी की छाया लिए इस गीत में थिरकन है, छुअन है, सिहरन है, आरजुएं हैं, तमन्नाएँ हैं और है दिलों के करीब होने का अहसास. इसमें बांसुरी की तान और रिदम  के झकोरों के बीच गीतों के कोमल स्वर कहीं अंदर, दूर तक छू जाते हैं. इस गीत में बोलों के प्रवाह को रोककर फिर गति देने की तर्ज़ में नवीनता, जिसमें रिदम को बेहतरीन तरीके से समन्वित किया गया है.


ऐसे रंग-भरे मदमस्त मौसम के बाद प्रकृति का रूप बदलता है. आ जाता है बूंदों के बरसने का हरियाला मौसम. जेठ-दुपहरी के बाद आकाश में बादलों का मंडराना और मन का पुलकित होकर इन्द्रधनुषी हो जाना अभिव्यक्त हुआ है  इस गीत में-
                  "छाये सघन घन सावन के,
                   मन मन के मनभावन के".
गीत का prelute सितार पर राग देस से आरम्भ होता है. इस गीत की सबसे बड़ी विशेषता ये है कि इसमें भूमिका, मुखडा, interludes  और अंतरा एकदम अनुस्यूत लगते हैं, जिसमें आधुनिकता के साथ शास्त्रीयता का अद्भुत संगम प्रस्तुत किया गया है. इसमें  रिदम का प्रयोग अंतर्लाप कि तरह हुआ है. अंतरे में शब्दों की पुनरावृत्ति  के साथ पूरे गीत में सितार का प्रयोग अत्यंत मनोहारी है. गीत के अंत में बांसुरी की तान के साथ तराने का उपयोग बड़े ही सुन्दर ढंग से किया गया है.


वर्षा के बाद करवट बदलते मौसम में शरद् का प्रवेश होता है. आश्विन-कार्तिक मास में शरद् का चन्द्र प्रेम की गीतांजलि गाने लगता है. राग मिश्र खमाज आधारित गीत- "शरद् की फैली छटा, नील नभ शांत है,"- पाश्चात्य बीट्स पर आधारित है, जिसे गिटार के कॉर्ड्स के साथ समन्वयित किया गया है. शैली 'कैरोल गान' की तरह है और इसमें प्रवाह, गति और तीव्रता का स्वाभाविक संगम है. इस गीत में कांगो के बीट्स, गिटार के कॉर्ड्स और इसके साथ हमिंग और हार्मोनी आकर्षक मेलोडी का सृजन करता है. गीत सुनकर लगता है जैसे नीरवता में सुरों की नदी कलकल करती बहती जा रही हो. अपनी सम्पूर्णता में ये गीत अभिभूत करने वाला है. 
                    
                    "बीत गया मैं एक वर्ष हूँ,
                     कैसे कटे हैं दिन न पूछो; 
                     मेरे अंतर के प्रश्नों का,
                     अब मुझसे उत्तर न पूछो."
मौसम सरे ख़त्म हुए, रंगों के, बूंदों के, सुगंधों के. वर्ष समाप्त होने को आया. मन अपने आप से पूछता है-बीते वर्ष में क्या पाया, क्या खोया ? फिर से एक नया वर्ष सामने है. ऐसे में ये गीत बीते हुए वर्ष की पूरी कहानी, बीते वर्ष की ज़बानी पेश करता है.
                     राग दरबारी की छाया लिए इस गीत में जीवन का दृष्टिकोण अभिव्यक्त हुआ है, जिसमें हलके आर्केस्ट्रेशन  के साथ स्वर की मेलोडी दिल को छूने  के साथ-साथ  हलकी-सी कसक भी देती है. इस गीत की धुन सीधी-सादी है, पर इसका प्रभाव अत्यंत गहरा है, जो बीते समय की याद को दर्दीला अभिव्यक्ति दे पाने में सक्षम है.


कुल मिलाकर एल्बम के सभी गीतों का स्वर रचनात्मक और वैविध्यपूर्ण है. इन गीतों में सुनील देवधर का संवेदनशील कवि-रूप तो अभिव्यक्त हुआ ही है, निवेदन में उनके स्वर की प्रांजलता और सच्चाई गीतों के आंतरिक लय को प्रकट कर पाने में समर्थ है.

                       संगीतकार-द्वय केदार दिवेकर और परीक्षित ढवले ने एल्बम के लिए पूरे elegance  और smoothness से काम किया है. यही कारण है कि इसके सभी गीतों में मेलोडी और लालित्य का श्रुतिमधुर सम्मिश्रण है.


संगीत और साहित्य को मिलाकर सर्जनात्मक चिंतन और लेखन एक दुरूह प्रक्रिया है, जो टीम-वर्क कि मांग करती है. इसमें दुखद पहलू ये है कि  इस तरह की रचनात्मकता आम जन तो क्या, विशिष्ट और चिंतनशील लोगों तक भी नहीं पहुँच पाती. शुभकामना है कि सुनील देवधर की ये कृति विशिष्ट और आम - सबके लिए सुलभ हो ताकि इस तरह की सर्जना और भी हो सके.

बुधवार, 7 अक्तूबर 2009

‘चेहरे’...(श्री रंजन का कहानी संग्रह)- प्रकाशन : अंश प्रकाशन, x - 3282, गली सं-4, गांधीनगर, दिल्ली-३१. प्रथम संस्करण- २००८ मूल्य- 110/- कुल पृष्ठ- 104



             श्री  रंजन  का  कहानी -संग्रह  ‘चेहरे’   पढने  का  अवसर  मिला . रंजन  जब  ये  कहते  हैं  कि  “उम्र  के  पचपनवें  वर्ष  में  मैंने  अपनी  पहली  कहानी   लिखी -‘तो  सलाम  मेरे  दोस्तों ’, सहसा  विश्वास  नहीं  होता  कि लेखक  की  ये  स्वीकारोक्ति  एक  अतिरिक्त  सौजन्यता  के  कारण  है  या  अत्म्श्लाघापूर्ण , या  फिर  वाकई  ये  विनम्रता  से  भरी  हुई  सच्चाई  है . लेकिन जैसे-जैसे एक-एक कहानी मेरे आगे खुलती गयी, मुझे यही लगा कि  बात को बिना लाग-लपेट के कहना रंजन जी कि अपनी अदा है, जो इस संग्रह की प्रत्येक कहानी में हर जगह मौजूद है. 
          संग्रह की पहली कहानी ही- ‘तो  सलाम  मेरे  दोस्तों ’- इस बात की गवाह है, जिसके मूल में यों तो भागलपुर का सांप्रदायिक दंगा है, परन्तु पूरी कहानी में फैंटेसी की एकतानता है, जो दंगे-जैसे गंभीर मुद्दे को उभरने नहीं देती. कहानी में 'प्लैनचेट'  का ज़िक्र है, जिसके इर्द-गिर्द कहानीकार के यथार्थ दोस्तों के रेखाचित्र उभरते हैं.  एक समय था, देवकीनंदन खत्री के ज़माने में,  जब हिंदी कहानी-कला मूलतः फैंटेसी या प्रेमचंदीय आदर्शवाद के इर्द-गिर्द रहा करती थी; 'प्लैनचेट' के नाम से लोग प्रायः अनभिज्ञ नहीं थे, पर आज के ज़माने में नयी  पीढी न तो इसके बारे में कुछ जानती है, ना ही इसपर विश्वास करने को तैयार होगी. 
            लेकिन इस कहानी की दो विशेषताएं ऐसी हैं, जिसके कारण ये श्रवणीय भी है, और पठनीय भी. सबसे पहली विशेषता ये कि इसमें  दृश्यों और घटनाओं के विवरण इतने प्रामाणिक और प्रासंगिक रूप से हैं कि लगता है जैसे हम स्वयं उनके साक्षी रहे हों. बल्कि सच्चाई ही ये है कि कहानी में आये तमाम नाम और चरित्र यथार्थ हैं- "तो मंज़र है, शहर भागलपुर के चौराहे का....खलीफाबाद....और खलीफाबाद में स्थित मशहूर  'चित्रशाला'. (इस आलीशान दूकान के मालिक कहानीकार स्वयं हैं.)....."सामने चाय की दूकान पर लोग-बाग़ खड़े-खड़े कुल्ल्ह्ड में चाय पीते हुए बतिया रहे थे. उसकी बगल वाली दूकान के अन्दर बैठा लड़का मोबाइल फोन की रिपेरिंग करने में व्यस्त था. 'साउंड ऑफ़ म्यूजिक'   नाम की टीवी की दूकान वाले ने सड़क के छोर तक फ्रिज और वाशिंग मशीन के ढेर लगा रखे थे."
             इन यथार्थ विवरणों के कारण कहानी में आदि से अंत तक रोचकता बरकरार रहती है, क्योंकि इसमें प्रवाह है, बिम्ब्धर्मिता है और वर्णना की मौलिकता है.  कहानी में फैंटेसी भी अंत में आता है, जब मशहूर कथाकार मंटो की आत्मा को 'प्लैनचेट' के माध्यम से बुलाया जाता है और उसके माध्यम से कहानी का आतंरिक अर्थ- दंगा, मज़हबी जुनून, कट्टरवादिता- आदि खुलता है. यहीं पर कहानी हांफने भी लगती है, जब कहानी का स्वर अचानक उपदेशात्मक हो जाता है; विशेषकर तब, जब उर्दू के लफ्जों का इस्तेमाल करते-करते मंटो एकाएक शुद्ध हिंदी के शब्दों का प्रयोग करने लगते हैं.  
संग्रह  की दूसरी  कहानी  ‘अक्सर  उसके  साथ  ही  ऐसा  क्यों  होता  है ’, जैसा  स्वयं  लेखक  की  स्वीकारोक्ति  है ,”इस  कहानी  के  मूल  में  थे  मेरे  मित्र  डॉ  अमरेन्द्र ….भागलपुर  के  इक  ग्रामीण  अंचल  में  ये  एक  ऐसे  कॉलेज   में  प्राध्यापक  थे , जो  अपनी  अफ्फिलिअशन  के  लिए  उस  वक़्त  प्रयत्नशील  था . उस  कॉलेज  की  त्रासदी , शोषण  और  प्राध्यापकों  का  संघर्ष …वास्तव  में  बेहद  भयानक  था  और  मुझसे     एक  कहानी  की  मांग  करता  था ”. कथाकार  जब  अपनी  रचना -प्रक्रिया  के  बाबत  कुछ  कह  देता  है  तो  दूसरों  के  कहने  की   ज्यादा  गुंजाइश  नहीं  होती . फिर  भी , इस  कहानी  में  एक  अभावग्रस्त  व्यक्ति  की  पीडा  और  अवसरवादी  कुटिल  लोगों  की  चालें  प्रमुखता  से  उभर  कर  सामने  आयी हैं . आज  शोषण  का  शिकार  सिर्फ  निचला  तबका  ही  नहीं  हो  रहा , बल्कि  मध्यवर्ग  का  बुद्धिजीवी  भी  भुगत  रहा  है , ये  इस  कहानी  से  स्पष्ट  है .
इसी  प्रकार  ‘पगला  था  वह ’ कहानी  संवेदनशील  लोगों  को  आज  के  ज़माने  में  मूर्ख   समझे  जाने  के  भाव को  प्रदर्शित  करती  है , जहाँ  कभी -कभी  दूसरों  की  मदद  करना  एक  अभिशाप  बन  जाता  है  और   मदद  करने  वाला  मुर्ख  तथा  पागल  समझा  जाता  है . ये  आज  के  यथार्थ  को  ‘व्यू फ़ाइन्दर’ से  देखने  की  कोशिश  है .
संग्रह  की  कहानी  ‘शून्य  में  टंगा  प्रश्न ’ मनोवैज्ञानिक  धरातल  का  स्पर्श  करती  है .  सच (डर) सबके  मन  के  अन्दर  होता  है , और  सभी  उसे  झुठलाना  चाहते  हैं . इसे  मनोविज्ञान  की  भाषा  में  superego   कहते हैं . ये  हर  व्यक्ति  के  भीतर  होता  है , जिसके  चलते  वह  अपने  को  सर्वश्रेष्ठ  और  दूसरों  को  हीन  समझता  है .
‘चार  अठन्नी ’ कहानी  तो  सीधे -सीधे  प्रेमचंदीय  परंपरा  की  कहानी  लगती  है , गांधीवाद  का  स्पर्श  करती  हुई . इस  लिहाज़  से  ये  थोडी  outdated  लगती  है  और  संग्रह  की  सबसे  कमज़ोर  कहानी  भी .
संग्रह  की  अंतिम  कहानी  ‘ज़िन्दगी  का  नाटक ’ में  बेटी  की  शादी  के  लिए  चिंतित  मध्यवर्गीय  परिवार  का  व्यक्ति  किसी  प्रकार  क़र्ज़  लेकर  व्यवस्ता  करता  है  तब  भी  उसकी  आशाएं  पूरी  नहीं  होतीं , इसका  चित्रण  अत्यंत  नाटकीय  ढंग  से   किया   गया  है . वस्तुतः  इस  कहानी  में  भरपूर  नाटकीय तत्व  हैं , इसलिए  ये  नाटक  के  ज्यादा  करीब  है .
             कुल  मिलाकर  संग्रह  की  कहानियों  में  सहजता  है , सरलता  है , बेबाकी  है . इनमें  आज  का  यथार्थ  परोसा  गया  है , जिनमें  अनावश्यक  चौंकाने  वाले  तत्व  अथवा   भाषा  की   कलाकारी  नहीं  है . 


मंगलवार, 6 अक्तूबर 2009

सोमवार, 5 अक्तूबर 2009

           सबसे पहले तो ये नाम- कनुप्रिया- मुझे बहुत पसंद है. शायद इसके मूल में धर्मवीर भारती की 'कनुप्रिया' पुस्तक के प्रति बेहद आसक्ति होना हो. इसलिए आपके ब्लॉग पर आना मुझे बहुत संतोष दे गया, सायद कहीं मुक्त भी कर गया मुझे.
            मैं सोच ही रहा था अपनी डायरी के पन्नों के सच को बाहर लाने के लिए, कि आपके लिखे ने मुझे गहन रूप से झिंझोर डाला, कि कहना आसान हुआ, कि पुरानी यादों में लौटने का इमकान हुआ.

रविवार, 4 अक्तूबर 2009

कुछ बना, कुछ अधबना सच लेकर अपने-अपने हिस्से का कौन-सा  ऐसा दुःख है, जो जलाता भी है और तृप्त भी करता है कि कुछ खोकर भी पाने का उपालंभ देता है....
अद्भुत है आपका ये प्रयास. इतने सारे स्केचेज और तस्वीरें क्या आपकी खुद की बनायीं हुई हैं...? अगर हैं तो कबीले तारीफ़ हैं. हमारे यहाँ भी पधारिये.
-भारती-

शनिवार, 3 अक्तूबर 2009

अप्रकाशित

'आपकी गज्जो'- एकल नाटक-राजीव रंजन श्रीवास्त
           राजीव रंजन श्रीवास्तव पटना रंगमंच में एक जाना-पहचाना नाम हैंवे लगभग  एक दशक से लेखक, निर्देशक और अभिनेता के रूप में सक्रिय हैं तथा हमेशा अभिनव प्रयोगों में संलग्न रहते हैं
अभी-अभी एक एकल नाटक उन्होंने मुझे पढने के लिए दिया- 'आपकी गज्जो'। लगभग ४० मिनट की अवधि का बनेगा ये नाटकये अभी ताज़ा है, प्रस्तुति के लिहाज़ से भी और अपने कथ्य के हिसाब से भी..... शायद अद्भुत...!
          ये नाटक एक ऐसी लड़की- गजाला- की आत्मस्वीकृति है, जो हमारे आपके घरों के आसपास- कहीं भी मिल जाएँगी, नाम उनके चाहे कुछ भी होंलेकिन गजाला की तरह हर लड़की विशिष्ट नहीं बन पाती, क्योंकि शायद वो सदियों से चली रही रवायतों और रस्मों के हाथों दफन कर दी जाती है
           इसके विपरीत इस गजाला के जीवन में अभाव है, दुःख है, बेबसी का पसरा हुआ सन्नाटा है; फिर भी होश है, हुनर है और हौसला है कुछ कर गुजरने कागजाला प्रतीक है उन तमाम लड़कियों की जो आज भी अभावों और मुफलिसी में जीती हुई अपने सपनो की तितलियों को रोज़ मरते देखने के लिए अभिशप्त हैं-
"मुहल्ले में दूसरों को मदरसे जाते देख,
किताबें पढ़ते देख
मुझे भी ललक होती की काश
मैं भी मदरसे जाती...."
         बदलते समाज और उसकी विसंगतियों के बीच गजाला का अंतर्द्वंद्व एक समूची पीढी के दर्द का बयान है, जहाँ कुछ कर पाने का उत्साह है तो बहुत कुछ नहीं कर पाने की बेबसी भी-
"मेरा भी मन होता की बुल्ला भाई की तरह मैं भी
मकतब में झूम-झूम कर पढूं
इसीलिए तो मैं बैठती थी
मस्जिद की सीढियों पर।
घर आकर बगैर किताबों के
झूठ-मूठ नक़ल करती आपकी गजाला
मेरा खूब मन करता की पढूं, पढूं और पढ़ती ही जाऊँ।"
         लेकिन इस बेबसी के भीतर जो थोड़ा-बहुत भी कर पाने का जज्बा है, वो ही गजाला को विशिष्ट  बनाता है- 
"अब्बू , मैं पढूंगी....
अब्बू, हदीस में भी है, कुरान में भी रत मोहम्मद साहब ने कहा है-
'तलाव्वुलिल्मे अलाकुल्ले मुस्लिम'
अब्बू बोल उठे-
'इसका मतलब बेटा...?'
मैंने कहा-
'तालीम और इल्म सारे मुस्लिमों के लिए लाज़मी है
इस बार अब्बू थोड़े संयत थे- बोले-
'बेटा, हमारे  यहाँ  केवल  लड़के  मकतब - मदरसा  जाते  हैं , 
लडकियां  नहीं. 
'लेकिन  मैं  तो  पढूंगी '
उनहोंने  कुछ  पल  सोचा ,
फिर  अच्छा  कहकर  निकल  पड़े ".
          गजाला के इस जज्बे   की  सच्चाई है, उसके बचपन के अभाव में, उसकी अम्मी के गुज़र जाने के वजूहात में....
"एक दिन तो मैंने कई तरह की आँखें बना डालीं
हंसती- मुस्कुराती आँखें, 
रोती हुई उदास आँखें , 
घबराई, बेचैन आँखें, 
चुलबुली और शरारती आँखें...
गुस्साई और तमतमाई आँखें,
शरमाई और लजाई आँखें,
आँखें...आँखें...आँखें...
सैकडों तरह की आँखें बनीं...
उन आँखों में मैं सबकी आँखें खोजने लगी...
अब्बू की अम्मी को खोजती आँखें,
अम्मी की प्यार वाली आँखें,
सोहेल की, साबिर की, बुल्ला की...  
साकिर  चा की...
मास्साब  की आँखें...."

              लेकिन इन सारे अभावों और गुर्बतों के बीच गजाला का संघर्ष और उसके 'बैक ड्रॉप' में वेदना का स्वर- 'शाहिद नहीं है' मोहब्बत के मुक़द्दस रूप से रु-बा-रु कराता है-
"आज भी याद है-
आर्ट कॉलेज की सीढियां ...
जिसपर शाहिद के साथ घंटों बैठती
पीछे का जंगल, गंदा बड़ा-सा नाला 
नामी-गिरामी चित्रकारों की पेंटिंग्स का बंद कमरा....
टाईपराइटर पर तक-तक करते क्लर्क,
पत्थरों को काट कर बनाये गए बाहरी परिसर में सोया कुत्ता... 
कॉलेज को ताकता हॉस्टल 
और हॉस्टल और कॉलेज के बीच लगे 
बाएं से तीसरे पेड़ के नीचे 
चाकू से उकेरा था हमनें 
'गजाला............चौदह दिसम्बर, उन्नीस सौ ..........'
शाहिद नहीं मिला..."
            प्रेम की ये पीर कहीं अन्दर तक चीरती हुई चली जाती है.
            कुल मिलाकर ये एकल नाटक अपनी बिम्बधर्मिता में बहुत कुछ कह जाता है, जिसे संवेदना के स्तर पर ही पकडा जा सकता है, और शायद उससे कहीं ज्यादा अनुभव किया जा सकता है. बावजूद इसके एकल नाटक में अंतर्द्वद्व की तीव्रता को जिस कलात्मक चरमसीमा तक पहुंचाने की आवश्यकता होती है, इसमें वो घनीभूत होने से रह गयी है. ऐसा शायद इसलिए हुआ है की लेखक के सामने नाटक का एक लक्ष्य (मिशन) स्पष्ट है, जो एकाधिक स्थानों पर संदेशात्मक रूप में दिखाई भी देता है-
"अम्मी कुछ भी पढ़ी होतीं या 
उन्हें कुछ भी तालीम हासिल हुई होती 
तो शायद अम्मी आज साथ होतीं."
"अब तो गजाला उन लड़कियों को 
अलग से पढाने का जिम्मा भी लेती है 
जो स्कूल जा पाने से लाचार हैं,
और जिनके यहाँ पढना भी बंदिश है"
**********************
  

सोमवार, 28 सितंबर 2009

रेकी उपचार

(यहाँ आप दूरस्थ चिकित्सा पद्धति से रेकी उपचार करा सकते हैं)


सुरों का सफर

(अनमोल गीतों की दुनिया के हमसफ़र बनें)


बिहार और झारखण्ड के दर्शनीय स्थल

(पर्यटन की दृष्टि से अनुपम और नयनाभिराम दृश्यों के साक्षी बनें)

बरसात में भीगती लडकियां





बरसात में भीगती लडकियां





अच्छी लगती हैं
बरसात में भीगती हुई लडकियां ,
लडकियां स्कूलों से लौटती
अपनी सहेली की बाँहों में झूलती-सी
आपस में करती हुई ठिठोलियाँ
उमंगों की नई डोर वाली पतंग पे सवार होती हैं
भीगती हुई लडकियां
लडकियां छेड़ती हैं एक -दूसरे को
शर्मीली मुस्कानों में
और चिडिया की -सी बातों में
किसी की नोटबुक में रखी है
तस्वीर शाहिद कपूर की ,
कोई है दीवानी
धोनी की ,
किसी की कॉपी से अचानक गिरता है मोरपंख
झुककर उठाते हुए
गर्व से बताती है सहेली को
‘मांगने के लिए वरदान कई रखा है इसे संभालकर ,
शायद सच हो जाए उनमें से कोई भी …’
पर नहीं जानतीं
बरसात में भीगती हुई लडकियां
अगले पाँच -छे -सात -आठ वर्षों में
मायने बदल जायेंगे
इस मौसम के इनके लिए …
शादी के बाद घर से जाएँगी लडकियां
बहू , भाभी , देवरानी , जेठानी -जैसे संबंधों कें नए नामों से
पुकारी जाएँगी ,
ज़िम्मेदारी के अहसास से
अपना अधिकार जताएंगी ,
उस घर को खुशहाल और स्वर्गिक बनाने में
अपना सर्वस्व लगाएंगी ….
अगले पाँच -छे -सात -आठ वर्षों में
नहीं होगा कोई शाहिद कपूर या धोनी
उनकी कापियों में तब ,
राशन की चीजों के नाम ,
धोबी का हिसाब
और सब्जियों के दाम
लिखे जायेंगे उन कापियों में ,
उन्हीं में जोड़ -तोड़कर
मुन्ने की पहली पसंद
खिलोनेवाली मौज़र पिस्तौल कैसे खरीदी जाए
इसकी भी गुंजाइश निकाली गई होगी
नोटबुक का मोरपंख
न जाने कब फिसल चुका होगा
स्मृति की अंधी सुरंग में
और वहां रखा होगा
बिजली का बिल ,
मकान -भाड़े और
मुन्ने के स्कूल की फीस की रसीद …
इसी तरह
वर्तमान से भविष्य तक के प्रस्थान -बिन्दुओं में
शामिल होती जाएँगी लडकियां
पर कहीं से भी तारीफ़ नहीं पाएँगी ,
हर वक्त , हर समय
कोसी ही जाएँगी
पता भी नहीं चलेगा उन्हें
कैसे एक भीगा हुआ मौसम
मर गया बेवक्त उनके अपने अंदर
और किस तरह वे छली गयीं
अपने ही मरे हुए सपनों की केसरगंधी तितलियों से …
इसलिए अच्छी लगती हैं
बरसात में भीगती हुई लडकियां …
उमंगों की नई डोर वाली पतंग पे सवार
वे जी लेती हैं पूरा जीवन
बरसात में भीगती लडकियां …
रचा लेती हैं
मौसम को मेहंदी की तरह
मन की हथेलियों पर
बिना जाने

कि आने वाला मौसम
रचनेवाला है साजिश काले अंधियारे की ..
पर उम्मीद बंधती है
कि बदलेंगे
वर्तमान से भविष्य तक के प्रस्थान -बिन्दु
बरसात में भीगती हुई लडकियां के
तब ये कोसी नहीं जाएँगी ,
छली नही जाएँगी ,
मौसम की यही चुहल ,
यही छेड़छाड़ ,
यही ठिठोली ,
ये जीवन -दर -जीवन लेती ही जाएँगी …
जीवन -दर -जीवन लेती ही जाएँगी …

õõõõõõ




गुरुवार, 24 सितंबर 2009

आभा पूर्वे का कहानी संग्रह-प्रकाशक : मनप्रीत प्रकाशन, १६/१६, प्रथम तल, गीता कालोनी, नई दिल्ली-३१ संस्करण : २००३, मूल्य- १००/-




चन्दन जल न जाए

(आभा पूर्वे का कहानी संग्रह)

अभी कुछ दिनों पहले भागलपुर की कहानीकार श्रीमती आभा पूर्वे का कहानी संग्रह 'चंदन जल न जाए' पढने का मौक़ा मिला। एक अद्भुत संतोष का अनुभव हुआ। आभा पूर्वे की कहानियाँ गागर में सागर हैं। अपनी प्रकृति में ये कहानियाँ लघुकथा के निकट जान पड़ती हैं। जिस प्रकार लघुकथाओं में एक प्रश्नातुर चिंता दिखती है, उसी प्रकार इनकी कहानियों में भी। गठन को लेकर हठीलापन जिस प्रकार लघुकथाओं में नहीं होता, उसी प्रकार आभा जी की कहानियाँ भी इस हठ से मुक्त हैं। सहज प्रवाह में, भाव-प्रवणता में जो सत्य बहता हुआ चला आया है, उसे ही कहानीकार द्वारा जस-का-तस रख दिया गया है। इसीलिए भाषिक आलंकारिकता और चमत्कारपूर्ण व्यंजनाओं से मुक्त ये कहानियाँ कहीं-न-कहीं मन को छूती हैं अपने बेबाकपन से, गुदगुदाती हैं अपनी सहजता से और उद्वेलित करती हैं अपने भीतर से उठते प्रश्नों से। फिर भी, आभा पूर्वे की कहानियाँ चिंतन-प्रधान मानी जाएँगी, जिनमें विवरण का आधिक्य नहीं है, परन्तु अपने कलेवर में ये कहानियाँ नितांत सामाजिक हैं.





शुक्रवार, 18 सितंबर 2009

मान न मान, मैं तेरा मेहमान

नई सड़क पर एक आदमी चला जा रहा था. उसे देखकर एक व्यक्ति बोला- " कहाँ जा रहे हो ?"
वो आदमी बोला- "अपने घर जा रहा हूँ ।"
" क्यों जा रहे हो ?"
"काम से लौट रहा हूँ, इसलिए ..."
"अच्छा-अच्छा...पर काम क्या करते हो..?"
" मैं बुनकर हूँ । नए-नए कपड़े तैयार करता हूँ।"
"और तुम्हारी बीवी...? वो क्या करती है॥?"
"वो मेरे लिए खाना बनाती है।"
"वो खाना क्यों बनाती है ?"
"क्योंकि मैं उसके लिए काम करता हूँ।"
कुछ लोग बिल्कुल इसी प्रकार के होते हैं, बाल में से खाल निकालनेवाले । आपको उनसे कुछ लेना-देना हो न हो, वो आपको यूँ ही परेशान करते रहेंगे। ऐसे लोगों से कैसे बचा जाए?